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Tuesday, December 27, 2016

चलिए, घूमें मंदार

समुद्र मंथन की बात कुछ अटपटी लगती है। कहां मंदराचल या मंदार पर्वत और कहां समुद्र? नक्शे में देखें तो नजदीक में बंगाल की खाड़ी में समंदर बसता है, जो यहां से सैकड़ों मील दूर है। भू-विज्ञान कहता है कि समुद्र की स्थिति जमीन की ऊंचाई-नीचाई के अनुसार बदलती रहती है। यह कोई जादू नहीं। जहां पहले समुद्र लोटता था, वहां अभी सभ्यताएं जीवित हैं। और, कुछ जगहों में समुद्र के नीचे भी विकसित सभ्यताओं के अवशेष मिले हैं। हो सकता है कि मंदार की भूमि पर पहले समुद्र लोटता हो।  
बिहार के बांका जिले में घूमने की बात करें तो मंदार क्षेत्र सबसे अव्वल रहेगा। अव्वल इस मामले में कि मंदार प्राकृतिक सुषमा से तो भरा-पूरा है ही, इसके पौराणिक महत्व इसके साक्ष्यों में चार चांद लगा देते हैं। पहाड़ी, पठारी और मैदानी रूप वाले बौंसी प्रखंड में इस मंदार पर्वत का होना बांका जिला ही नहीं, पूरे बिहार सूबे के लिए गौरव की बात है।
            साफ जलवायु, पानी और यहां के लोगों के भले व्यवहार के चलते बौंसी को जो दर्जा मिला है उसे पुख्ता करने में धर्म और इतिहास की भूमिका कम नहीं है। बात अगर हिंदू धर्म की करें तो जहां से सृष्टि निर्माण हुई है, यह वही जमीन है। धर्मशास्त्र बताते हैं कि समुद्र मंथन यहीं से हुआ। बासुकी नाग को इस पर्वत के चारों ओर लपेटकर देवता और दानवों ने अपनी-अपनी ताकतों से इसे खींचा और चौदह रत्न निकाले। धन और भाग्य की देवी लक्ष्मी, अमृत और विष यहीं से निकले। विष को लेने जब कोई तैयार नहीं हुए तो देवाधिदेव महादेव ने इसे पीया और अपने गले में ही रोककर नीलकंठ कहलाए। मतलब कि धर्मशास्त्रों की मानें तो लक्ष्मी यहीं पैदा हुईं और शिव का नीलकंठ रूप यहीं से ज्ञात हुआ।
            समुद्र मंथन की बात कुछ अटपटी लगती होगी। तिसमें भी, कहां मंदराचल या मंदार पर्वत और कहां समुद्र! नक्शे में देखें तो इधर नजदीक में समंदर बंगाल की खाड़ी में बसता है जो यहां से सैकड़ों मील दूर है। किंतु, समुद्र की स्थिति को जीवविज्ञान की स्थापित मान्यता फ्लोरा और फउनासे अगर तुलना की जाए तो यह पता चलता है कि समुद्र की स्थिति जमीन की ऊंचाई-नीचाई के अनुसार बदलती रहती है और यह कोई अजूबा बात नहीं कि जहां पहले समुद्र हुआ करता था वहां अभी सभ्यताएं जीवित हैं और कुछ जगहों में समुद्र के नीचे भी विकसित सभ्यताओं के अवशेष मिले हैं। एडम्स ब्रिज (श्रीराम सेना द्वारा निर्मित लंका पुल) और श्रीकृष्ण की द्वारिका सहित कई नगरों की सभ्यताओं के अवशेष समुद्र की तलहटी में मिले हैं। यहां यह सोचा जा सकता है कि क्या ये भवन, नगर और सभ्यताएं पानी के नीचे ही बसाई गई थी! दिमागी कीड़े को थोड़ा और जिंदा करें तो पाएंगे कि जमीन के जीवों का विकास जलीय जीवों के बाद हुआ है। मतलब कि आदमी से पुराने जीव कोरल रीफ व मछलियां हैं और ये सभी पानी में ही पैदा हुईं। कुछ वर्षों पूर्व आई सुनामी ने स्थापित वैज्ञानिक सिद्धांत को सत्यापित करते हुए यह बता दिया कि समुद्र जमीन की तरफ कैसे बढ़ता है और अपनी जमीन; जहां वह पहले लोटता था उसे कैसे छोड़ता है। इससे यह साबित होता है कि पूरी पृथ्वी की सतह पर समुद्र कहीं भी फैल सकता है। हो सकता है कि मंदार की भूमि पर भी ऐसा कुछ हुआ।
            बात अगर जैन धर्म की करें तो इनके बारहवें तीर्थांकर वासुपूज्यजी को इसी पर्वत पर निर्वाण मिला। ये चंपा (भागलपुर) के राजघराने से थे। जैनियों के लिए यह क्षेत्र काफी महत्व रखता है। वजह यही है कि हर साल जैन धर्मावलंबी हजारों की संख्या में यहां वासुपूज्य की निर्वाणस्थली को देखने आते हैं।
यातायात
मंदार क्षेत्र पटना-हावड़ा रेलमार्ग की दोनों ब्रॉड गेज़ लाइनें क्रमशः जसीडिह और भागलपुर से जुड़ी हुई है। जसीडिह-भागलपुर पहुंच पथ से सड़क मार्ग के जरिए 81 किलोमीटर पर बौंसी या महाराणा हाट उतरकर मंदार पहुंचा जा सकता है। अगर आप भागलपुर से आना चाहते हैं तो 50वें किलोमीटर पर बौंसी है। यहां देखने और घूमने के लिए कई जगह हैं। इनमें चांदन डेम भी काफी सुदर्शन और सुरम्य है। बौंसी से मंदार की दूरी 5 किलोमीटर और चांदन डेम की दूरी 21 किलोमीटर है। दोनों तरफ जाने के लिए पहुंच पथ फिलहाल दुरूस्त हैं।
दर्शनीय स्थल
मंदार :
लगभग 700 मीटर ऊंचे इस पर्वत का मुख्य हिस्सा एक ही पत्थर से बना है। कुछ लोगों का कहना है कि मदार यानी आक के फूलों के बहुतायत में मिलने की वजह से इस पर्वत का नाम मंदार पड़ा।
पापहरिणी तलाब :
मंदार पर्वत की तलहटी में यह तलाब स्थित है।
लक्ष्मी-नारायण मंदिर :
पापहरनी तलाब के बीचोंबीच यह खूबसूरत मंदिर कुछ वर्षों पहले बनाया गया है।
सफा धर्म मंदिर :
पापहरिणी के तट पर आदिवासियों व गैर-आदिवासियों का यह मंदिर स्थापित है जिसे गुरु चंदरदास ने बनवाया है। दरअसल इस मत को स्थापित करनेवाले बाबा चंदरदास ही थे।
सर्प चिह्न :
मान्यता है कि समुद्र मंथन के वक्त बासुकीनाग की पेटी के घर्षण से यह चिह्न बना है। 
मंदिरों के भग्नावशेष :
मुगलकाल में कालापहाड़ के आतंक का गवाह यहां के मंदिरों के भग्नावशेष हैं।
सीता कुंड :
पर्वत के ऊपर यह तलाब है जिसके पानी की सतह तलाब के भित्तिचित्र छूते हैं। कहते हैं कि माता सीता ने यहां स्नान कर लव-कुश जैसे योद्धाओं की माता होने का गौरव पाया। 
गौशाला :
भगवान नरसिंह को रोजाना खीर भोग लगाने हेतु यहां गाएं पाली जाती हैं। ये गाएं श्रद्धालुओं द्वारा दिए गए दान से प्राप्त हैं जिसकी देखभाल कुछ साधु करते हैं।
शंख कुंड :
सीता कुंड व गौशाला के समीप यह छोटा-सा शंक्वाकार कुंड है जिसकी तली में 9 मन का पत्थर का वामहस्त का शंख है।
नरसिंह गुफा :
8x12x3 फीट ऊंचाई वाली इस अंधेरी गुफा में भगवान नरसिंह की प्रतिमा है जिनकी पूजा रोजाना होती है। 
राक्षस मधु के विशाल सिर का भित्तिचित्र :
वास्तुशिल्प के दृष्टिकोण से यह भित्तिचित्र मंदार पर्वत पर उपस्थित सभी मूर्तियों और भित्तिचित्रों में अव्वल है जिसकी तारीफ कई विदेशी विद्वानों ने की है।
पाताल कुंड :
मधु के विशाल सिर के पास ही पाताल कुंड है। दरअसल यह एक गुफा है जिसमें सालोंभर पानी रहता है। इस पानी में कई तरह की वनस्पतियां पाई जाती है जिसे पादप विज्ञानी दुर्लभ प्रजाति के शैवाल मानते हैं। 
निर्मल जल कुआं :
इस कुआं का पानी काफी मीठा है जिसकी पौष्टिकता प्रमाणित और सत्यापित है।
काशी विश्वनाथ मंदिर :
पर्वत के ऊपर यह शिवजी का एक मंदिर है। कुछ वर्षों से यहां स्थानीय लोगों के सहयोग से शिव बारात निकाली जाती है।
राम झरोखा :
पर्वत के शिखर के थोड़ा नीचे झरोखानुमा एक कमरा है जहां से नीचे और आसपास के इलाके का अवलोकन किया जा सकता है।
जैन मंदिर (हिल टॉप) :
यह मंदिर 50-60 वर्षों से जैनियों के कब्जे में है जिसे स्थानीय ज़मींदारों ने चंद रुपयों के लालच में बेच दिए। आज भी यह विवादित स्थल है। कई अंग्रेज इतिहासकार और सर्वेयरों ने लिखा है कि यह मंदिर लॉर्ड विष्णु का है।  
मंदार विद्यापीठ :
पर्वत की तलहटी से दक्षिण-पूर्व में मंदार विद्यापीठ है जिसे इस क्षेत्र के गरीब-महरूम लोगों को शिक्षा देने के लिए दक्षिण भारतीय विद्वान आनंद शंकर माधवन ने अपने गुरु व पूर्व राष्ट्रपति डा. जाकिर हुसैन से आशीर्वाद लेकर खोला था। अब यहां मंदार विद्यापीठ के तहत एक +2 तक एक स्कूल और शिक्षक प्रशिक्षण महाविद्यालय चलता है।
चैतन्य पीठ :
नाम संकीर्तनकी बंगाली परंपरा के संचालक चैतन्य महाप्रभु सन 1905 में यहां आए थे। उसी समय इस पीठ की स्थापना की गई थी जो मंदार विद्यापीठ और पर्वत के बीच में है।
नाथ मंदिर :
प्राचीन काल में नाथ संप्रदाय के नगा साधु यहां रहकर साधना किया करते थे। यह ग्रेनाइटों के स्लैब से बना घर था, जो अब जीर्ण-शीर्ण अवस्था में विद्यमान है।
लखदीपा मंदिर :
इन मंदिरों में कभी दीवाली के अवसर पर लाखों दीये जलाए जाते थे। इस मंदिर का अवशेष झाड़ियों के बीच मौजूद है। यह मंदिर नाथ मंदिर के समीप ही है। 
राजा-रानी पोखर :
इस पोखर के बीच में एक लाट होने के कारण इसे लाट वाला पोखर भी कहते हैं।

सागर मंथन स्टेच्यू :
कुछ वर्षों पूर्व इस स्टेच्यू को शांति निकेतन (बोलपुर, पश्चिम बंगाल) के शिल्पी नंद कुमार मिश्र ने बनाया। यह पापहरिणी के ऊपर एक बड़े पत्थर के टीले पर सफा मंदिर के पास है।
लाल मंदिर :
मंदार-बौंसी पथ पर पापहरिणी के समीप लाल मंदिर है जिसे बिड़ला ने बनवाया था।
जैन मंदिर (बारामती) :
भगवान बासुपूज्य ने यहां साधना की थी। यह मंदिर मंदार-बौंसी पथ पर है।
मधुसूदन मंदिर :
यह प्राचीन मंदिर बौंसी में स्थित है। जनवरी माह की 14वीं तारीख से यहां वृहद मेले का आयोजन होता है जो एक महीने तक चलता है। यह मंदिर उड़िया और मुग़ल शैली का मिश्रित रूप है।
गरूड़ रथ :
भगवान मधुसूदन को रथयात्रा के वक्त बौंसी बाजार तक इसी रथ से लाया जाता है। यह काफी खूबसूरत है जो स्थानीय दाताओं की सहायता से निर्मित है।
फगडोल :
उड़िया शैली में निर्मित यह संरचना मुग़ल स्थापत्य कला की मेहराब की तरह ही है जहां साल में एकबार होली के वक्त भगवान मधुसूदन की प्रतिमा को रखकर गुलाल चढ़ाया जाता है। इस वक्त यहां काफी भीड़ होती है जिसमें नगरवासी हिस्सा लेते हैं। 
प्राचीन शिव मंदिर :
मधुसूदन मंदिर के पास स्थित यह शिव मंदिर काफी पुराना है।
संत भोली बाबा आश्रम :
संत परंपरा के निर्वाहक भोली बाबा का यह आश्रम उनके शिष्यों के लिए तीर्थ है। बाबा स्थानीय निवासी थे और नाम संकीर्तन के स्वयं प्रचारक थे और प्रचार करने का उपदेश देते थे। यह आश्रम मधुसूदन मंदिर के करीब है।
शिव मंदिर :
यह रेलवे स्टेशन के समीप है जिसे एक धर्मप्राण स्थानीय मारवाड़ी परिवार ने पूजा-अर्चना के लिए बनवाया था।
जैन मंदिर (बौंसी) :
यह जैन मंदिर दक्षिण भारत की स्थापत्य कला से ओतप्रोत मालूम होता है। यह रेलवे स्टेशन के नजदीक है।
काली मंदिर :
बौंसी थाना के गेट के पास यह काली मंदिर है जहां रोज शाम को भक्तों की भीड़ रहती है।
दुर्गा स्थान :
वैष्णवी रूप की पूजा इस इलाके में सिर्फ यहीं होती है। दुर्गापूजा के समय यहां लोगों की काफी भीड़ रहती है। प्रत्येक बुधवार व शनिवार को यहां हाट लगती है।
गुरुधाम :
योगी श्री श्यामाचरण लाहिड़ी के शिष्य श्री भूपेन्द्र नाथ सान्याल ने इस जगह की स्थापना योगपीठ के तौर पर की। बौंसी-भागलपुर रोड पर बौंसी से एक किलोमीटर की दूरी पर यह जगह है। हर साल बसंत पंचमी के अवसर पर यहां उनके परंपरागत शिष्यों की भीड़ रहती है। 
गुरुकुल :
श्यामाचरण पीठ से संचालित इस गुरुकुल की स्थापना वैदिक ज्ञान और रिसर्च के लिए की गई है। यह संस्था गुरुधाम के अहाते में ही निर्मित व वित्तपोषित है।
ठहरने के लिए
रेलवे गेस्ट हाउस :
बौंसी में मंदारहिल रेलवे स्टेशन के परिसर में 12 कमरों वाले रेलवे गेस्ट हाउस का निर्माण मालदा रेल प्रमंडल ने सन् 1998 में कराया है। चूंकि इस रेल लाइन को हावड़ा मेन लाइन के ब्रॉड गेज से जोड़ने की परियोजना पर काम चल रहा है इसलिए अफसरों के यहां ठहरने के लिए इसका निर्माण कराया गया है। किंतु, आम लोग भी रेलवे द्वारा निर्धारित राशि को जमाकर यहां कमरा किराए पर ले सकते हैं।
आईबी, आईबी-वन विभाग (मंदार), आईबी-सिंचाई, छापोलिका धर्मशाला (बौंसी), जैन धर्मशाला और कई होटल भी हैं।
कब आएं
जनवरी-फरवरी
जनवरी, 13 को मंदार में सफा धर्मावलंबियों का व राष्ट्रीय मेला लगता है जिसमें कंपकंपाती ठंड में इस धर्म के अनुयायी साधना करते हैं। इस अवसर पर प्रशासन द्वारा जलाने के लिए लकड़ी व डॉक्टर की सुविधा भी रहती है।
जनवरी, 14 से यहां एवं बौंसी में मधुसूदन मंदिर के सामने एक महीने तक मकर संक्रांति के अवसर पर मेला लगता है। इस वक्त प्रशासन की ओर से सभी तरह की आवश्यक सेवाएं मुहैया कराई जाती हैं। पूर्वी बिहार का यह सबसे बड़ा मेला है। 
जुलाई-अगस्त
मौसम साफ रहने की वजह से फोटोग्राफी करनेवालों के लिए यह क्षेत्र पसंदीदा है। साथ ही यहां के मुख्यमार्ग पर श्रावण महीने में बासुकीनाथ जानेवाले कांवरियों को देखकर आनंद उठाया जा सकता है। साथ ही, उनकी सेवा करके पुण्य अर्जित की जा सकती है। वनस्पतियों का अध्ययन करनेवाले और इसे संचय करनेवालों के लिए यही समय सबसे अच्छा होता है। अतएव, इस मौसम में आपको वनस्पतियों के जानकारों से आपकी मुलाकात हो सकती है। लेकिन, सबसे बड़ी बात है कि बारिश की वजह से पत्थरों पर उग आई काई/शैवालों की वजह से आपको तकलीफ उठानी पड़ सकती है। इस वक्त आपको संभल कर चलना होगा।

Sunday, December 25, 2016

मणियारपुर की वैश्विक अलख महर्षि मेंहीं धाम

मणियारपुर का मनोरम पहाड़ी प्रांतर! संत शाही स्वामीजी महाराज के पुनीत संकल्पों का कर्म-क्षेत्र! मानव मात्र के आत्म-कल्याण की तपोभूमि है मणियारपुर का यह महर्षि मेंहीं धाम।प्रकृति के एकांतिक सुरम्य आंचल में आश्रम बनाने की दीर्घ परम्परा का निर्वाहन ही यहां भी हुआ है ।
श्रीजाबालदर्शनोपनिषद् (सामवेद का, खण्ड-5) में एतदर्थ निर्देश मिलता है -
पर्वताग्रे नदीतीरे बिल्वमूले वनेऽथवा ।
मनोरमे शुयौ देशे मठ कृत्वा समाहितः ।।
रामचरित मानस में भगवान श्रीरामजी बाल्मीकिजी के आश्रम की प्राकृतिक सुषमा देखकर मुदित हो गये। श्रीबाल्मीकि मुनि का निवास स्थान आश्रम निर्वाण की पृष्ठभूमि के लिये एक आदर्श निर्देश माना जा सकता है -
देखत बन सर सैल सुहाए । बालमीकि आश्रम प्रभु आए ।।
राम दीख मुनि बासु सुहावन । सुंदर गिरि कानन जलु पावन ।।
सरनि सरोज विटप बन पूफले । गुंजत मंजु मध्ुप रस भूले ।
खग मृग बिपुल कोलाहल करहीं । बिरहित बैर मुदित मन चरहीं ।।

संतमत के संस्थापक आचार्य सद्गुरु महर्षि मेँहीँ परमहंसजी महाराज ने महर्षि मेँहीँ धामतथा अन्य आश्रमों के निर्माण में इन्हीं परम्पराओं का निर्वाह किया है।
महर्षि मेँहीँ धाम बिहार राज्य के बाँका जिले के बौंसी प्रखंड में है। यह बिहार और झारखंड का सीमांत क्षेत्र है। यह मनोरम धाम बौंसी से लक्ष्मीपुर डैम तक जानेवाली सड़क पर लगभग 10 किलोमीटर की दूरी पर अवस्थित है। इसके आस-पास में पर्वत और वन हैं। ढलती शाम में हंसडीहा (दुमका) और मोहनपुर (देवघर) की पर्वतमालाओं की चोटियों पर धुँध की चादर, दूर-दूर तक ऊँची-नीची पहाड़ी भूमि, कहीं-कहीं फसल की हरियाली, लाल मिट्टी, चुभते कंकड़, बेतरतीब पहाड़ी पेड़-पौधे, बड़े-छोटे ताड़ और खजूर के पेड़ और तन-मन को तरोताजा करती सरसरी हवा। महर्षि मेँहीँ धाम के पूरब उत्तर दिशा में विशाल हरना बांध और उसकी बाँहों में सिमटा बड़ा-सा जलाशय! रंग-बिरंगे पक्षियों के विभिन्न तरीके के कलरव, ताड़ की फुनगियां पर सूरज का पीला प्रकाश और जलाशय में हास भरती चिड़ियों के झुंड। प्रकृति की नयनाभिराम प्रस्तुति! प्रकृति का यह अद्भुत दृश्य, शांत, एकांत और नैसर्गिक सौंदर्य मानव-मन को सहज ही अन्तर्मुखी बना देते हैं।
महर्षि मेँहीँ धामकी स्थापना के मूल में सद्गुरु महर्षि मेँहीँ परहंसजी महाराज की महती कृपा परिलक्षित होती है। संतमत-सत्संग के प्रचार के लिए इनका पदार्पण अक्सर इस क्षेत्र में होता था। यहां की जीवनदायिनी जलवायु, नैसर्गिक सौंदर्य, रमणीय वातावरण से इनके अंतस्थल में आश्रम निर्माण की इच्छा जगी। संत की मौज के आगे प्रकृति और उसके चराचर जीव सभी विनयावनत हो जाते हैं। भक्तों के अन्दर सत्प्रेरणा उत्पन्न हुईं और उनके सद्प्रयास से आज से लगभग पचपन वर्ष पूर्व 22 सितम्बर 1961 को दलघट्टी, गोड्डा, झारखंड के स्व. महादेव पूर्वे और उनके पुत्र स्व. हरि पूर्वे ने 8 एकड़ 88 डिस्मल जमीन दानस्वरूप देने की कृपा की। स्थानीय सत्संगियों ने आपसी सहयोग से तब तीन कमरों का छोटा सत्संग मंदिर बनाया जिसमें सद्गुरु महाराज का निवास भी था। आज उसी स्थल पर विशाल सत्संग प्रशाल है। संत सद्गुरु महर्षि मेँहीँ ने 1980 ईस्वी में इसे विशेष रूप देने के उद्देश्य से सत्संग मंदिर का शिलान्यास चाँदी की करनी से किया था और इस स्थान को सेनिटोरियम (स्वाथ्यवर्द्धक) की संज्ञा दी थी अर्थात् शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक सभी क्षेत्रों में स्वास्थ्यवर्द्धन। आज उनकी कृपा से महर्षि मेँहीँ धाममें लगभग 26 एकड़ जमीन है।
महर्षि मेँहीँ धाम पर पौराणिक तीर्थस्थल मंदार पर्वतकी महिमा का प्रभाव स्पष्ट परिलक्षित होता है। मंदार पर्वत भारत के प्र्रमुख तीर्थों में से एक है। प्राचीन काल से ही यह संत महात्माओं, सिद्धों और विद्वानों का आश्रय स्थल रहा है। कहा जाता है कि समुद्र मंथन के समय मंदार पर्वत को मथानी बनाया गया था।
भारत वर्ष में चार धामों की चर्चा होती है - बद्रिका आश्रम, जगन्नाथ धाम, रामेश्वरम तथा द्वारिका धाम। वृंदावन धाम और केदारनाथ धाम भी उल्लेखनीय हैं। महर्षि मेँहीँ धामउन्हीं धामों की अद्यतन कड़ी है। यहाँ से एक ईश्वर की मान्यता पर ज्ञान-योग-युक्त ईश्वर भक्ति का प्रचार किया जाता है। इन धर्मिक स्थानों के नाम के अंत में धामशब्द लगने के कारण संत शाही स्वामीजी महाराज के द्वारा इस स्थान का नाम भी महर्षि मेँहीँ धामरखा गया। इसके आसपास बैद्यनाथ धाम, बासुकीनाथ धाम, गोनू धाम, मधुसूदन धाम, गुरु धाम जैसे पवित्र स्थल हैं।
महर्षि मेँहीँ धामपरिसर में स्थित संत शाही निवासकलात्मक सौंदर्य का एक अद्भुत नमूना है। इस भवन का बरामदा प्रदक्षिणा-पथ है। इसी परिसर में एक कुआँ है, जिसका जल अति स्वादिष्ट और मृदु था। आश्रम में निवास के समय महर्षि मेँहीँ जी इसी जल का उपयोग करते थे और भक्तों से इस कुएँ के जल की प्रशंसा भी करते थे। कुप्पाघाट आश्रम या अन्यत्र कहीं भी निवास के क्रम में वे इसी कुएँ का जल मंगाकर उपयोग में लाते थे। आज इस कुएं को यथावत सुरक्षित रखा गया है। उस कुएँ की दीर्घकालीन सुरक्षा के लिये काम किया जा रहा है।
संत शाही निवासके दक्षिण में संत रामलगनजी महाराज की समाधि है जिसकी श्वेत आभा उनकी गुरु भक्ति और उनके अकलुषित जीवन-चरित्र को प्रतिभाषित करती है। इसके उत्तर में विशाल संत शाही समाधि मंदिरहै, जिसका शिलान्यास महासभा के तत्कालीन अध्यक्ष ब्रह्मलीन पूज्य श्री हुलास चंद्र रूँगटाजी ने किया था। समाधि मंदिर का विशाल गुंबद उन्मुक्त आकाश में संत शाही स्वामीजी के त्याग, तपस्या, गुरु-भक्ति और लोकमंगल के लिये आत्मोत्सर्ग की अध्यात्मिक कीर्ति-गाथा समस्त दिशाओं में फैला रहा है। इस समाधि मंदिर का भूमिगत विशाल गोलाकार ध्यान-प्रशाल धर्मिक संस्थाओं के लिये एक आदर्श है। इसके मध्य-भाग में संत शाही स्वामीजी की समाधि है, जहां उनके पूत शरीर का अंतिम संस्कार किया गया था। इसके ऊपरी मंजिल पर संग्रहालय का निर्माण किया जा रहा है। संपूर्ण समाधि मंदिर को मकराना के सुंदर पत्थरों से आवेष्ठित कर सजाया जा रहा है। इस समाधि मंदिरमें एक हजार साधक एक साथ ध्यान कर सकते हैं।
संत शाही निवासके पूरब गुरु-निवास मंदिरमें पांच कमरे हैं। गुरु-निवास कक्ष में सद्गुरु महर्षि मेँहीँ परमहंसजी का अस्थि-कलशस्थापित है जहां उन्हें सिंहासन पर विराजित किया गया है। इसके पश्चिम-उत्तर दिशा में भोजनालय, उत्तर-पूरब दिशा में संत शाही गोशालाएवं संत शाही अन्नपूर्णा’, पूरब-दक्षिण में महर्षि मेँहीँ हृदय गुफा, पश्चिम-दक्षिण में विशाल सत्संग प्रशाल और पूरब दिशा में चार खण्डों में निर्मित ध्यान-शिविर और विशाल आम्रवाटिका आश्रम को गरिमा मंडित करता है। सन् 1990 ईस्वी में निर्मित चारों शिविर क्रमशः बाल्मीकि आश्रम, गुरुनानक दरबार, वेदव्यास आश्रम और गोस्वामी तुलसीदास आश्रम के नाम से जाने जाते हैं। इन शिविरों के पूरब में छोटी कुटी है जहां संत शाही साहब साधकों के साथ ध्यान करते थे। ध्यान-शिविरों का यह पूरा परिसर महर्षि मेँहीँ विहारके नाम से जाना जाता है। इन्हीं शिविरों से सटे पूरब-उत्तर दिशा में 20 फीट व्यास का एक भव्य कुआं है जिसे संत शाही साहब ने वर्ष 1991 में बनवाया था। उस समय कृषि कार्य के लिये इस कुएं का जल बड़ा ही उपयोगी था। आश्रम परिसर में एक होमियो क्लिनिक भी है जहां एक धर्मप्राण भाई शत्रुघ्न चौधरीजी गुरुश्री के आदेश से रोगियों की निःशुल्क सेवा करते हैं।
संत शाही स्वामी जी महाराज ने अपने जीवन काल में ज्येष्ठ कृष्णपक्ष तृतीया विक्रम संवत 2068 को संतमत जैसी विशाल संस्था संचालन की जिम्मेदारी स्वामी चतुरानंदजी महाराज को सौंपने की कृपा की। इसे इतिहास में एक अद्भुत दृष्टांत माना जाता है।
महर्षि मेँहीँ धाममें प्रतिवर्ष कई महत्त्वपूर्ण कार्यक्रम आयोजित होते हैं जिनमें अपार श्रद्धा से काफी संख्या में भक्तगण उमड़ पड़ते हैं। महर्षि मेँहीँ जयंती (वैशाख शुक्ल चतुदर्शी) एवं गुरु-पूर्णिमा को पूरे आश्रम परिसर की साज-सज्जा की जाती है जिसमें श्रद्धालुओं का सैलाब उमड़ पड़ता है । भक्तगण भंडारा का प्रसाद ग्रहण करते हैं और सत्संग व भजन का सात्विक आनंद लेते हैं।         

महर्षि मेँहीँ परमहंसजी महाराज के गुरु थे परम संत बाबा देवी साहब। बाबा साहब का जन्म संत तुलसी साहब के आशीर्वाद से हुआ था। इन्हीं परमसंत बाबा देवी साहब के महापरिनिर्वाण की पुण्य स्मृति में 1991 ईस्वी से निरन्तर 16 जनवरी से 14 फरवरी तक मास ध्यान-साधना-शिविरका आयोजन किया जाता है। संत शाही स्वामीजी महाराज ने यहां मास-ध्यान की परम्परा चलायी थी । ध्यानाभ्यास आत्मोद्धार का प्रयोगात्मक प्रयास है और है भगवान् बुद्ध की ध्यान परंपरा का अद्यतन स्वरूप। अब परम पूज्य प्रधान आचार्य स्वामी चतुरानंदजी महाराज के सान्निध्य में आत्मोद्धार का यह आयोजन होता है, जिसमें सैकड़ों साधक और साधु-महात्मा सम्मिलित होते हैं। वर्ष 2012 ईस्वी से यहां प्रतिवर्ष सद्गुरु-ज्ञान-महोत्सवका विशेष आयोजन होता है। यह कार्यक्रम सद्गुरु महर्षि मेँहीँ परमहंसजी महाराज की जयंती से प्रारंभ होता है, इसका समापन उनके महापरिनिर्वाण दिवस पर होता है। ज्ञातव्य है कि 17 दिनों की इसी अवधि में उनके पावन हृदय-स्वरूप संत शाही स्वामीजी महाराज की जयंती और महापरिनिर्वाण भी समाहित हैं। इस कार्यक्रम में ग्यारह दिवसीय निःशुल्क ध्यान-शिविर का आयोजन होता है जिसमें एक हजार साधक एवं साधिकाओं की निःशुल्क व्यवस्था की जाती है। इसका समापन चार दिवसीय सत्संग एवं भंडारा के साथ होता है। वर्ष 2016 ईस्वी में यहां पहली बार वर्षावास-ध्यान-शिविरका आयोजन किया गया। यह आयोजन सिर्फ आचार्यों और सन्यासियों के हित में दो माह के लिए किया गया था। वर्ष 2017 ईस्वी में यह कार्यक्रम तीन माह के लिये आयोजित होंगे। अभी बारह मासा ध्यान-शिविर चल रहा है, जिसमें कुछ महात्मा और साधक एक वर्ष तक लगातार शिविर के नियमों का अनुपालन करेंगे। ऐसे कार्यक्रर्मों में प्रतिदिन पाँच घंटे का ध्यान और तीन बार सत्संग होते हैं। यहां के सामान्य कार्यक्रर्मों में भारत के विभिन्न राज्यों यथा- बिहार, बंगाल, उड़ीसा, उत्तर प्रदेश, जम्मू-कश्मीर, पंजाब, हरियाणा आदि से भक्तों के आगमन होते हैं। विदेशों से भी भक्त यहां आते हैं, जिनमें नेपाल, जापान, अमेरिका, सिंगापुर, मलेशिया, आस्ट्रेलिया के लोग होते हैं। यहां प्रतिदिन दर्शनार्थियों की आवाजाही रहती है, जो इस संत की तपोभूमि का पावन रज ललाट पर धारण कर गौरवान्वित होते हैं। छुट्टियों में स्कूल के बच्चे दूर-दूर से बस में सवार होकर आते हैं और इस तीर्थ स्थल के दर्शन का लाभ लेते हैं। बरसात में बाबाधाम देवघर और बासुकीनाथ तीर्थ जाने वाले दर्शनार्थी भक्तों की नित्य भीड़ लगी रहती है।
महर्षि मेँहीँ धामसे महर्षि मेँहीँ परमहंस जी महाराज और संत शाही स्वामीजी महाराज के साहित्य एवं उनके प्रवचनों के संकलन प्रकाशित होते हैं तथा दो मासिक पत्रिकाएं भी प्रकाशित की जाती हैं- शान्ति संदेशऔर सन्तमत प्रचार-पत्रिका। इन पत्रिकाओं के द्वारा जन-जन तक अध्यात्म ज्ञान का प्रचार-प्रसार किया जाता है। यहां से प्रतिवर्ष देश के विभिन्न भागों में अखिल भारतीय, प्रांतीय, जिला, अनुमंडल, प्रखंडादि संतमत-सत्संग तथा ध्यान-शिविर का आयोजन किया जाता है जिसका उद्देश्य जन-जन को संदेश देना है कि ‘‘सबका ईश्वर एक है, उसे पाने का रास्ता भी एक है, यह रास्ता सबके अंदर से है।’’
महर्षि मेँहीँ धामआज सिद्धपीठ की गरिमा से मंडित दर्शनीय तीर्थ-स्थल बन गया है। यहां संतों के नाम पर ध्यान-शिविरों एवं भवनों के नामकरण किए गए हैं। मंदिर की दीवारां पर संतां के भित्तिचित्र, सत्संग में सब संतन्ह की बड़ि बलिहारीका तन्मय गायन, सद्ग्रंथ पाठ में संत-वाणी, प्रवचन में संतों की वाणियों का आधार, एक नाम- संतमत, एक लक्ष्य- संतचरण लौ लाई’, एक उद्देश्य- ज्ञान-योग-युक्त ईश्वर भक्ति का प्रचार करना। संतों के ज्ञान-रस में डूबा हुआ परिवेश महर्षि मेँहीँ धामका- लाल मिट्टी, लाल वस्त्र, या यूं कहें कि लाली मेरे लाल की जित देखो तित लाल’... से पूरित रहता है। यहां का परिवेश भक्ति-रस आपूरित है जो भक्तों को अपना रंग देता है- भक्ति और ध्यान का, सदाचार और शूच्याचार का, जीवन की सार्थकता का- भजिय राम सब काम बिहाई का...’’
महर्षि मेँहीँ धामकी वादियों में बीसवीं शताब्दी के महान संत महर्षि मेँहीँ परमहंसजी महाराज का अमर संदेश गुंजित-प्रतिगुंजित होता रहता है-
सत्संग नित अरु ध्यान नित, रहिये करत संलग्न हो ।

व्यभिचार चोरी नशा हिंसा, झूठ तजना चाहिये ।।

क्रिया योग की दीक्षा पीठ गुरुधाम

पूरी सृष्टि में विभिन्न धर्म-मत-संप्रदायों के मानने वाले हैं। सबके पूजा-अराधना की पद्धतियां भी विभिन्न हैं। इन अलग-अलग ईश्वर को एक ही सत्ता माननेवाले संतों को जेडीया जेडिथकहा जाता है। इन जेडी संतों की पुनर्जन्म में आस्था होती है। भारत में ऐसे संतों की संख्या काफी है। योगिराज भूपेन्द्र नाथ सान्याल भी इसी कड़ी के संत थे। दुनिया की प्राचीन पुस्तक वेदऔर वैदिक परंपराओं में उनकी आस्था थी। योगिराज श्यामाचरण लाहिड़ी इनके गुरु थे जिनके आदेश से इन्होंने अपने गुरु की परंपराओं को आगे बढ़ाया।
स्वामी परमहंस योगानंद द्वारा लिखित ऑटोबायग्राफी ऑफ अ योगीको भला कौन नहीं जानता होगा! यह, किसी योगी द्वारा लिखित सर्वाधिक बिक्री वाली किताबों में एक है। वे, स्वामी श्री युक्तेश्वर गिरि के शिष्य थे और श्री युक्तेश्वर योगिराज श्यामाचरण लाहिड़ी के शिष्य थे। यहां ऐसा कहा जा सकता है कि श्री युक्तेश्वर गिरी और सान्याल महाशय गुरुभाई थे। ये सभी क्रियायोगी थे। स्वामी श्री युक्तेश्वर गिरि ने द होली साइंसलिखा था जो आज भी काफी प्रासंगिक है। अंग्रेजी में उपलब्ध इस पुस्तक को पश्चिम में काफी पढ़ा गया और पसंद किया गया।
कहते हैं कि शिर्डी के साईं बाबा के गुरु भी श्यामाचरण लाहिड़ी थे। एक पुस्तक पुराण पुरुष योगिराज श्री श्यामाचरण लाहिड़ीमें इसका उल्लेख मिलता है। इस पुस्तक को लाहिड़ीजी के सुपौत्र सत्यचरण लाहिड़ी ने अपने दादाजी की हस्तलिखित डायरियों के आधार पर डॉ. अशोक कुममार चट्टोपाध्याय से बांग्ला भाषा में लिखवाया था। इसका हिंदी अनुवाद छविनाथ मिश्र ने किया था। इसमें कोई दो राय नहीं कि सबका मालिक एककहनेवाले साईं बाबा भी अपने धर्म का अक्षरसः पालन करते हुए सभी धर्मों का आदर जेडी संतों की तरह करते थे। यहां यह स्पष्ट है कि साईं भी इसी परंपरा के संत थे।
समुद्र मंथन का गवाह मंदार; सदियों से देवी-देवताओं, संत-योगियों के लिए सर्वोत्तम स्थलों में से एक रहा है। रामायण, महाभारत और विष्णु पुराण से अलग भी इसके कुछ लिखित-अलिखित आदर्श इतिहास हैं। नाथ-संप्रदाय के नाथों और नगाओं से भी यह क्षेत्र अछूता नहीं रहा। चंपा नगरी के राजकुमार वसुपूज्य ने इसी पर्वत के ऊपर तप किया और निर्वाण को प्राप्त हुए। कभी अंग महाजनपद तो कभी बंग साम्राज्य का हिस्सा रहे इस मंदार क्षेत्र में चैतन्य महाप्रभु का आगमन भी हुआ जिसकी चर्चा चैतन्यचरितावलीमें है। यह भू-भाग महात्मा भोलीबाबा, महर्षि मेंही की साधना-भूमि भी रही। यहां उन्हें चैतन्य की प्राप्ति हुई और वे रम गए। आचार्य भूपेन्द्रनाथ सान्याल को अपने गुरु से अवचेतन में जब मंदार क्षेत्र में आश्रम बनाने का आदेश मिला तो वे उन्होंने अपने गुरुवर की याद में बौंसी-भागलपुर मुख्यमार्ग पर एक आश्रम बनाकर इसे भारतीय संस्कृति की परंपराओं को बनाए रखने के लिए सौंप दिया और गुरु-शिष्य परंपरा का निर्वाहन किया।
भागलपुर से 50 किलामीटर की दूरी पर बौंसी स्थित है। इसी मार्ग पर बौंसी से डेढ़ किलोमीटर पहले सड़क की दाहिनी ओर एक पुराना लेकिन भव्य मुख्यद्वार है। यही गुरुधाम या आश्रम का मुख्य मार्ग है। मुख्यमार्ग से लगभग 200 मीटर दूर आश्रम है लेकिन गेट से चंद कदमों आगे ही बायीं ओर वेद और योगपीठ नजर आने लगता है जो आश्रम द्वारा संचालित है।
योगिराज श्यामाचरण लाहिड़ी महाशय के परम शिष्य आचार्य भूपेन्द्रनाथ सन्याल के द्वारा 1929 में इस आश्रम की स्थापना की गयी थी। मंदार पर्वत की तराई में आचार्यश्री ने योगनगरी को बसाया था। इसी परिसर में अपने परमगुरुदेव श्यामाचरण लाहिड़ी के इच्छानुसार एक मंदिर की स्थापना 1944 में की जो आज भी उसी रुप में विद्यमान है।
मंदिर के एक भाग में सान्याल बाबा ने अपने गुरु योगिराज श्यामाचरण लाहिड़ी महाशय की प्रतिमा स्थापित की, जबकि दूसरे भाग में शिव-पंचायतन की स्थापना की थी। यहां की व्यवस्था को सुचारू तरीके से चलाने के लिए गुरुधाम ट्रस्ट की स्थापना 1943 की गयी जिसे बाद में 1948 में संशोधित किया गया। यहां के गुरुभाईयों की मानें तो इस आश्रम की स्थापना का मुख्य उद्देश्य शिष्यों का नैतिक एवं आध्यात्मिक उन्नति करना, यहां होने वाले धार्मिक उत्सवों में सेवा व्यवस्था देना सहित अन्य हैं। साथ ही सान्याल बाबा द्वारा रचित पुस्तकों का प्रकाशन करना भी है।
गुरुधाम आश्रम को क्रिया योग के प्रमुख केंद्र के तौर पर जाना जाता है। योग क्रिया की दीक्षा देने की परंपरा वर्षों पुरानी है। गुरुधाम आश्रम की स्थापना आचार्य श्री भूपेन्द्र नाथ सान्याल ने इसी उद्देश्य से की थी कि इस विद्या को जन-जन तक सूक्ष्म तरीके से पहुंचाया जा सके और अपने उद्देश्य में आचार्य सफल भी हुए। भारत वर्ष में लाहिड़ी महाशय के शिष्यों द्वारा स्थापित आश्रमों में से गुरुधाम आश्रम सबसे महत्वपूर्ण है जहां पर क्रिया योग की दीक्षा दी जा रही है। आचार्य श्री भूपेन्द्र नाथ सान्याल जी के द्वारा एक अन्य आश्रम की स्थापना उड़ीसा के जगन्नाथ पुरी में वर्ष 1926 में की गई जो आज भी मौजूद है। ऐसा माना जाता है कि क्रिया योग राजा जनक, श्रीराम और संत कबीर जैसे मनीषियों ने भी किया था। आचार्य श्री सान्याल बाबा के अनुसार क्रिया योग तप, स्वाध्याय, ईश्वर प्राणिधानामी है जिसमें उन्होंने बताया है कि प्राणायाम और सद्ग्रंथ के पाठ से आत्मका दर्शन होता है। आत्म की ओर जाना ही स्वाध्याय है। परमगुरुदेव लाहिड़ी महाशय के संप्रदाय में क्रिया योग को वैज्ञानिक पद्धति से सरलतम एवं व्यवहारिक रूप से उपदेशित किया जाता है जिसे क्रिया योग को अनुसरण करने वाले साधक दिन में दो बार सुबह-शाम करते हैं।
गुरुधाम आश्रम में प्रातः साढ़े चार बजे से आश्रम की दिनचर्या प्रारंभ हो जाती है। सुबह में मंगलाचरण का पाठ होता है। इसके बाद सात बजे मंगल आरती होती है जिसके बाद गुरुदेव की प्रतिमा को प्रसाद चढ़ाया जाता है। दोपहर में भोग लगाने के बाद प्रतिदिन काफी संख्या में गुरुभक्त प्रसाद ग्रहण करते हैं। दोपहर में मंदिर का पट बंद रहता है तीन बजे के बाद पुनः मंदिर में वेदपाठी बटुकों के द्वारा वेद-पाठ होता है। शाम में छह बजे आरती के बाद सत्संग होता है। यहां पर क्रिया योग का अभ्यास नितदिन किया जाता है। यहां क्रिया योग में अभ्यास पर काफी जोर दिया जाता है जो एक तरह से गुरु की अनुपालना है। इस आश्रम से क्रिया योग की दीक्षा लेकर काफी संख्या में वेदपाठी व योगी देश-विदेशों में इसका प्रचार-प्रसार कर रहे हैं। 1943 से इस आश्रम में निरंतर क्रिया योग की दीक्षा दी जा रही है।
संस्कृतदेवभाषा कही जाती है जिनसे वेद, उपनिषद, पुराण, रामायण जैसे शास्त्रों की रचना हुई है। ऋषि मुनियों ने वेद जैसे आर्ष साहित्य की रचनाओं को वैश्विक स्तर पर संरक्षण देने हेतु विभिन्न आश्रमों की स्थापना कीं, जहां संस्कृत माध्यम से सैद्धांतिक एवं व्यवहारिक कर्मकांडों के सहारे शिक्षार्थियों को ज्ञान देना प्रारंभ किया। इसी कड़ी में बंगोत्कल योग विद्या से जुडे़ महान साधक आचार्य भूपेन्द्रनाथ सन्याल ने मंदार क्षेत्र में परमयोगी अपने गुरुदेव व योग प्रवर्तक श्री श्यामाचरण लाहिड़ी महाशय की स्मृति में गुरुधाम आश्रम की स्थापना की एवं विरासत में मिली गुरु की कृपा से उन्होंने वेद-विद्या, योग एवं देव भाषा संस्कृत को जन-जन में फैलाने हेतु श्यामाचरण वेद विद्यापीठकी स्थापना की और आज; तब का वह छोटा सा पौधा विशाल वट वृक्ष की भांति अपने उदेश्य में प्रगति के पथ पर अग्रसर है।
श्यामाचरण वेद विद्यापीठ में प्रथम कक्षा से वेद की पढ़ाई के साथ-साथ संस्कृत-डिग्री मध्यमा एवं शास्त्री के अध्ययन की व्यवस्था है। प्रथम कक्षा में वैसे छात्रों का नामांकन किया जाता है जो ब्रह्मचर्याश्रम के साथ-साथ यज्ञोपवित संस्कार एवं बटुक के रुप में सामवेद व यजुर्वेद की ऋचाओं का अभ्यास पाठ कर सके। ऐसे ही बटुकों को उत्तीर्णोपरांत क्रमशः मध्यमा और शास्त्री की कक्षाओं में प्रवेश दिया जाता है।
यहां पर वैदिक संस्कृति की तर्ज पर ब्रह्मचर्य आश्रम की स्थापना की गयी है जिसमें आठ से दस साल के बच्चों को चयनित कर वेद का अध्ययन-पारायण कराया जाता है। यह इसलिए किया गया ताकि देव भाषा संस्कृत व वेद की शिक्षा अगली पीढ़ी तक जा सके। यहां की मान्यता है कि संस्कृत अगर पठन-पाठन में रहे तो संस्कार स्वतः ही विकसित हो जाते हैं।

वर्तमान में आश्रम में गुरुद्वय आचार्य श्री प्रभात कुमार सान्याल एवं आचार्य श्री अमरनाथ तिवारी गुरुपद पर आसीन हैं जो गुरुभक्तों को सत्य का मार्ग बता रहे हैं। इस आश्रम में साल में दो बार भव्य आयोजन होता है। इस कड़ी में वसंत पंचमी के अवसर पर पांच दिवसीय वसंतोत्सव का आयोजन किया जाता है। इस अवसर पर देश-विदेश के गुरुभाई-बहन यहां पहुंचते हैं। साथ ही, हजारों दरिद्रनारायणों को भोजन एवं वस्त्र दिया जाता है। दूसरा आयोजन गुरु-पूर्णिमा के अवसर पर किया जाता है। इसमें भी हजारों शिष्य आश्रम में पहुंचते हैं और गुरुसे पल्लवित-पुष्पित होने का आशीष ग्रहण करते हैं।