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Monday, December 28, 2020

मंदार क्षेत्र के 'यक्ष' ही हैं जख बाबा

प्राचीन अंगदेश (महाजनपद) के वर्तमान भागलपुर क्षेत्र में सड़कों के किनारे पेड़ों को पूजे जाने की परंपरा प्राचीन काल से है। इन्हें 'जख बाबा' कहा जाता है। लोग इन्हें लोक देवता की संज्ञा देते हैं। इनको पूजन-चढ़ावा देने की रीत है। कई जगहों में वार्षिक पूजा भी लंबे समय से होती रही है। गौर करने वाली बात है कि ये जख बाबा जिन रास्तों पर मिलते हैं वे सभी पथ प्राचीन काल के हैं। इन इलाकों के बूढ़े लोग जख के शौर्य की गाथा सुनाते हुए अब भी मिल जाएंगे।

यह जख संस्कृत के 'यक्ष' शब्द का अपभ्रंश है। यक्ष और रक्ष दो शब्द हैं। यक्ष वे शक्तियाँ हैं जो देव और लोक हितों के रक्षक हैं। रक्ष वे शक्तियाँ मानी गई हैं जिन्हें देवता और मनुष्यों का कल्याण बुरा लगता है। रक्ष से ही राक्षस शब्द बना है जो खलनायक की छवि उपस्थित करते हैं लेकिन यक्ष तो सदा से ही कल्याणार्थ माने गए हैं वजह यही है कि इनकी पूजा होती है।
धनपति कुबेर भी यक्ष हैं। इनको इनके संस्कारों के आधार पर यक्ष की श्रेणी में रखा गया है जबकि इनके सौतेले भाई रावण, कुंभकर्ण को रक्ष संस्कृति का संवाहक होने के कारण राक्षस कहा गया है।
#दीपावली_पूजन में अधिकतर लोग लक्ष्मी और गणेश का पूजन करते हैं जबकि कुबेर के बिना इनका पूजन सम्पूर्ण नहीं। किन्तु, याद रहे कि कुबेर देवता नहीं, यक्ष हैं। ये धन के संरक्षक हैं जो धन की चलायमानता को स्थायित्व देनेवाले के तौर पर प्रतिष्ठित हैं। वजह यही है कि इनके गण-गणिका को भारतीय रिजर्व बैंक के दिल्ली स्थित मुख्यालय के बाहर स्थापित किया गया है। ये दोनों कुबेर के प्रतिनिधि हैं।
कुबेर को उत्तर दिशा का दिक्पाल, अधिपति या स्वामी माना जाता है। शास्त्रों में 10 दिशाएँ माने गए हैं। इन सभी दिशाओं के अलग-अलग दिक्पाल हैं। यह भी कहा जाता है कि कुबेर सभी दिक्पालों के दिक्पाल हैं।
'महाभारत' में जिस उत्तरापथ की चर्चा होती है वो आज का जीटी रोड है। यह तामलुक (बंगाल) से आरंभ होकर तक्षशिला (अफगानिस्तान) तक जाती है। यह सड़क आज 4 देशों क्रमशः बांग्लादेश, भारत, पाकिस्तान और अफगानिस्तान तक जाती है। इस सड़क की चर्चा ग्रीक श्रोतों में भी मिलती है। यह भी कहा जाता है कि इसका पुनर्निर्माण अपने समय में चन्द्रगुप्त मौर्य ने भी कराया था और अशोक ने भी।
कहा गया है कि इस उत्तरापथ के उत्तरी क्षेत्र में कुबेर का वास था। सम्पूर्ण उत्तरी क्षेत्र का आधिपत्य कुबेर का था। इसलिए उत्तरी क्षेत्र में कुबेर को अधिक प्रतिष्ठा मिली है।
कुबेर की राजधानी अलकापुरी बताई गई है जिसे हिमालय पर एक हिस्से में बताया गया है। यह भी कहा जाता है कि कुबेर का उपवन #मंदराचल पर्वत पर था जिसे 'चित्ररथ वन' कहा गया है। इस चित्ररथ वन को चित्ररथ नामक एक गंधर्व ने तैयार कर कुबेर को दिया था। पौराणिक सूत्र बताते हैं कि मंदार के नीचे कई सघन वन थे जिन्हें अलग-अलग नामों से संबोधित किया गया है।
उत्तरापथ और प्राचीन अंग की राजधानी चम्पा को जोड़नेवाली सड़क अब SH-19 (इसे NH-133 की मंजूरी मिली है) के नाम से जानी जाती है। मुगल काल, ईस्ट इंडिया कंपनी और ब्रिटिश शासन के दौरान इसे भागलपुर-सूरी मार्ग कहा गया। यह सूरी नामक जगह आज सिउड़ी (पश्चिम बंगाल) के नाम से ज्ञात है जहां से जीटी रोड गुजरती है। यह सूरी शब्द अफगान शासक शेरशाह सूरी के सरनेम से लिया गया है। मंदार पर्वत इसी भागलपुर-सूरी मार्ग पर अवस्थित है। 'बिहार दर्पण' में गदाधर प्रसाद अंबष्ठ लिखते हैं कि यह भागलपुर की सबसे प्राचीन सड़क है। अपने समय में यह विशिष्ट व्यापारिक मार्ग था। इस सड़क के किनारे अभी भी कुछ यक्षों की उपस्थिति पेड़ों में है। इन यक्षों के नाम पर आसपास के ग्राम हैं। कुछ यक्षों को उनके पेड़ों के नाम से पुकारे जाने के प्रचलन है। इनके सामने से गुजरने वाले वाहन इन्हें कुछ सिक्के देकर गुजरते हैं। यह प्रथा प्राचीन काल में भी होने की जानकारी मिलती है।
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के सूत्र बताते हैं कि उत्तरापथ / जीटी रोड के किनारे से यक्षों की काफी प्रतिमाएँ प्राप्त हुई हैं जो विभिन्न संग्रहालयों में हैं। एक प्रतिमा पहली शताब्दी की भी मिली है जिसकी फोटो यहाँ संलग्न हैं।
मंदार से कुबेर की कुछ मूर्तियों के मिलने की जानकारी मिलती है लेकिन अब ये कहाँ हैं और कब की हैं; कोई अता-पता नहीं है।

Sunday, August 2, 2020

अंग जनपद के बिना मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम की कल्पना अधूरी





    
रामायण काल में 'अंग जनपद' के राजा थे रोमपाद। इन्हें चित्ररथ और लोमपाद भी कहा गया है। ये बृहद्रथ /धर्मरथ के पुत्र थे। कौशल जनपद के नरेश सुकौशल और महारानी अमृतप्रभा की ज्येष्ठ सुपुत्री वर्षिणी से इनका विवाह हुआ था। महाराज की दूसरी पुत्री थी कौशल्या। तब 'अवध जनपद' के राजा थे दशरथ। कौशल और अवध के बीच वैर था। 
    अवध नरेश दशरथ से रोमपाद की बहुत अच्छी मित्रता थी। अपनी साली कौशल्या का विवाह राजा दशरथ से कराने में रोमपाद की बड़ी भूमिका थी। इस वैवाहिक संबंध के बाद कौशल और अवध की दुश्मनी समाप्त हो गई। इस बात को इस तरह से समझा जाए कि श्रीराम की माँ कौशल्या का विवाह दशरथ से कराने में अंग जनपद की बड़ी भूमिका रही। यह पहला कारण है।   
    दशरथ को कौशल्या से एक पुत्री हुई जिसका नाम शांता था। राजर्षि की सलाह पर अवध नरेश दशरथ ने इस पुत्री को अंग नरेश रोमपाद को पौषपुत्री के रूप में सौंप दिया। दशरथ के राजर्षि ने ग्रह-गोचरों की स्थिति के अध्ययन के उपरांत कहा था कि यह बालिका अयोध्या के हित में नहीं है अतएव इसे किसी को गोद में दे दिया जाए। कहा गया कि इस पुत्री के रहते राजा दशरथ के यहाँ कोई संतान पैदा नहीं होगी। अंग नरेश रोमपाद इस घड़ी में उनके हितरक्षक बने और शांता को सहर्ष पुत्री के रूप में ग्रहण कर लिया। यह दूसरा कारण रहा। 
    इस विलक्षण पुत्री शांता को अंग जनपद में लाने के बाद वार्षिनी से भी इन्हें एक पुत्री हुई जिसका नाम 'चतुरंग' (चतुरंग खेल की शुरुआत करनेवाली) रखा गया। किशोरवय में शांता का आमात्य सुमंत के कहने पर अंग जनपद के ऋषि विभंडक के अप्सरा उर्वसी से उत्पन्न पुत्र शृंगी के साथ विवाह कर दिया। इस विवाह के उपरांत ऋषि शृंगी ने अनुष्ठान कर अंग जनपद में वर्षा के लिए देवता वरुण और देवराज इन्द्र को प्रसन्न किया। कहते हैं कि पुत्री (शांता) का विवाह ऋषि शृंगी से कराकर दशरथ के हित में राजा रोमपाद ने एक और कार्य किया था। यह तीसरा कारण था। चूंकि, शांता सदैव दाशरथी के नाम से जानी गई। इसी कारण से कुछ लोगों को भ्रम होता है कि राजा रोमपाद का एक अन्य नाम 'दशरथ भी है। 

    
अब जो सबसे बड़ी बात थी/ कारण था; वो यह कि अंग नरेश रोमपाद ने ऋषि शृंगी को प्रसन्न कर अवध नरेश दशरथ के लिए पुत्रेष्ठि यज्ञ कराया। मतलब कि जमाता (दामाद) ने अपने श्वसुर के लिए यह यज्ञ किया। लेकिन, इस यज्ञ में दशरथ मात्र एक यजमान रहे और शृंगी पुरोहित। इस यज्ञ के उपरांत ही राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न इस धरा पर आए। इससे पहले दशरथ ने संतान की इच्छापूर्ति के लिए कौशल्या के अतिरिक्त दो अन्य विवाह कर लिए लेकिन प्रारब्ध ऋषि शृंगी की प्रतीक्षा कर रहा था जिसका सूत्रधार अंग जनपद था। अयोध्या पर अंग जनपद का यह सबसे बड़ा उपकार था। 
    ऋषि शृंगी से शांता के विवाह का अर्थ था शृंगी के पिता विभंडक के क्रोध का कारण बनना। राजा रोमपाद ने यह जोखिम अपने सिर पर लिया। इस विवाह के बाद क्रोध से तप्त ऋषि विभंडक को भी इन्होंने ही झेला। 

इस प्रसंग में ऋषि वाल्मिकी कृत 'रामायण' के श्लोकों को भी देखा जाए -

          अङ्ग राजेन सख्यम् च तस्य राज्ञो भविष्यति।
          कन्या च अस्य महाभागा शांता नाम भविष्यति।। 
          - (काण्ड-1, सर्ग-11, श्लोक-3)
अर्थ - 
उनकी शांता नाम की पुत्री पैदा हुई जिसे उन्होंने अपने मित्र अंग देश के राजा रोमपाद को गोद दे दिया, और अपने मंत्री सुमंत के कहने पर उसका  विवाह शृंगी ऋषि से तय कर दी थी।

          अनपत्योऽस्मि धर्मात्मन् शांता भर्ता मम क्रतुम्।
          आहरेत त्वया आज्ञप्तः संतानार्थम् कुलस्य च।। 
          - (काण्ड-1, सर्ग-11, श्लोक-5)
अर्थ - 
तब राजा ने अंग के राजा से कहा कि मैं पुत्रहीन हूँ, आप शांता और उसके पति श्रृंग ऋषि को बुलवाइए मैं उनसे पुत्र प्राप्ति के लिए वैदिक अनुष्ठान कराना चाहता हूँ।

          श्रुत्वा राज्ञोऽथ तत् वाक्यम् मनसा स विचिंत्य च।
          प्रदास्यते पुत्रवन्तम् शांता भर्तारम् आत्मवान्।। 
          - (काण्ड-1, सर्ग-11, श्लोक-6)
अर्थ -
दशरथ की यह बात सुन कर अंग के राजा रोमपाद ने हृदय से इसबात को स्वीकार किया, और किसी दूत से शृंगी ऋषि को पुत्रेष्टि यज्ञ करने के लिए बुलाया।

          आनाय्य च महीपाल ऋश्यशृङ्गं सुसत्कृतम्।
          प्रयच्छ कन्यां शान्तां वै विधिना सुसमाहित।।
          - (काण्ड-1, सर्ग-9, श्लोक-12)
अर्थ -
शृंगी ऋषि के आने पर राजा ने उनका यथायोग्य सत्कार किया और पुत्री शांता से कुशलक्षेम पूछ कर रीति के अनुसार सम्मान किया।

           अन्त:पुरं प्रविश्यास्मै कन्यां दत्त्वा यथाविधि।
           शान्तां शान्तेन मनसा राजा हर्षमवाप स:।। 
           - (काण्ड-1, सर्ग-10, श्लोक-31)
अर्थ -
(यज्ञ समाप्ति के बाद) राजा ने शांता को अंतः पुर में बुलाया और रीति के अनुसार उपहार दिए, जिससे शांता का मन हर्षित हो गया।

    इक्ष्वाकु कुल में पैदा हुए श्रीराम अगर आज मर्यादा पुरुषोत्तम के रूप में दुनिया भर में पूज्य हैं तो इस हिस्से का बड़ा श्रेय #अंग_जनपद को भी जाता है। ...और इस मौके पर अंग जनपद (अब का भागलपुर केन्द्रित) को परित्यक्त किया जाना कितनी बड़ी ऐतिहासिक मानवीय भूल होगी ! 
    हालांकि, अंग जनपद के मन्द्राचल पर्वत से अयोध्या में जन्मभूमि मंदिर निर्माण हेतु मिट्टी और जल विश्व हिन्दू परिषद द्वारा ले जाने की सूचना है मगर वह #चम्पा जो तब राजा रोमपाद की राजधानी थी यहाँ से किसी प्रकार की ऐसी सूचना नहीं है। हाँ, यह #चम्पा अब भी मौजूद है। यह अब एक विशाल टीला (Mound) है जिसपर अब हजारों घर बस चुके हैं। यहाँ बिहार पुलिस का एक विशाल प्रशिक्षण केंद्र भी है जिसे 18वीं सदी के 8वें दशक में स्थानीय कलेक्टर ऑगस्टस क्लीवलेंड ने स्थापित किया था। यह जगह अब भी 'चंपानगर' के नाम से ख्यात है और इस टीले को अभी 'कर्ण टीला' के नाम से जाना जाता है। इस टीले के किसी भी हिस्से में मामूली खुदाई होने पर अब भी सुंदर नक्काशीवाले पाषाण-स्तम्भ निकलते हैं। यहाँ से प्राप्त कुछ मूर्तियाँ, टेराकोटा खिलौने, मृदभांड, स्तम्भ कई संग्रहालयों की शोभा बढ़ा रहे हैं। ये सभी तत्व इसके पुरातन होने की पुष्टि करते हैं। अब तो इस चम्पा नगर के वाह्य स्तंभों की खोज भी विद्वान इतिहासकारों ने कर लिए हैं। यह नगर उत्तरवाहिनी गंगा के किनारे बसा हुआ है जहां कभी महर्षि पालकाप्य ने 'हस्त्यायुर्वेद' की रचना की थी जो महान राजा रोमपाद को उनके द्वारा दी गई सीख थी। आयुर्वेद की एक शाखा माने गए इस 'हस्त्यायुर्वेद' में हाथी के उपचार और रखरखाव के बारे में विस्तार से बताया गया है। इसे 'गज आयुर्वेद' के तौर पर भी जाना जाता है। 

Friday, April 17, 2020

चोल (गंगईकोंड) से संबन्धित शाश्वत स्थानीय प्रश्न

राजराजा चोल ने बंगदेशम पर सन 1021-22 में चढ़ाई कर दी तब यहाँ पालवंश के राजा महिपाल का शासन था और असम (प्रागज्योतिषपुर में) ब्रह्मपाल का।
तिब्बती सूत्र बताते हैं कि इस दौरान विक्रमशिला महाविहार (भागलपुर के कहलगांव स्थित) के आचार्य अतीश दीपांकर सन 1013 से ही 12 वर्षों तक वर्तमान इंडोनेशिया के श्रीविजय साम्राज्य में थे।
तभी राजराजा ने अपने साम्राज्य में बढ़ोत्तरी करते हुए इंडोनेशिया के श्रीविजय पर भी अधिकार कर लिया। इस दौरान दीपांकर के बंगाल प्रांत में आने और फिर यहाँ से तिब्बत जाने के क्रम का विवरण इनके बारे में पुस्तक लिखने वाले किसी लेखक ने विस्तार से नहीं लिखा है। कहा इतना गया है कि वे आजन्म फिर तिब्बत में ही रह गए।
गौरतलब है कि श्रीविजय का संबंध अंगदेशम (जो उस वक्त बंगदेशम का हिस्सा था) से अति प्राचीन था जो दीपांकर के वक़्त भी कायम था। तब श्रीविजय मिलिट्री प्रभुत्व वाला प्रदेश था जहां बौद्धधर्म पल्लवित-पुष्पित था।
राजराजा के दक्षिणी गंगाक्षेत्र (बंगदेशम) के विजय के समय आचार्य दीपांकर की उम्र 41-42 की थी। शायद बंगाल के तत्कालीन शासक महिपाल की नाकामी की वजह से उन्हें नाराजगी थी। लेकिन इस संदर्भ में तिब्बती स्रोत पूर्णतः लामा तारानाथ (17वीं शताब्दी) की कपोल कल्पना के भरोसे उड़ान भरता है। आज के विद्वान भी तारानाथ के अलावे राहुल सांकृत्यायन के सूत्रों के भरोसे टिके हुए हैं जो स्वयं भी तारानाथ पर आधारित हैं।
सवाल पैदा होता है कि दीपांकर ने उपरोक्त राजनीतिक परिदृश्य के बारे में तिब्बत में कुछ कहा तो होगा? अगर कहा तो क्या कहा और नहीं कहा तो क्यों नहीं कहा, इसपर खोज की जरूरत है।
तिब्बत से प्राचीन पुस्तकों को खच्चर पर लादकर राहुल सांकृत्यायन पटना ले आए थे। उसमें कुछ पेंटिंग्स भी थी जिसे पटना के पुराने संग्रहालय में रखा गया है। वहाँ से लाई गई किताबें उन्होंने सिन्हा और खुदाबख्श खां लाइब्रेरी में दे दिए लेकिन रखरखाव में अनदेखी के कारण बर्बाद हो गई। ये किताबें मोर और भोट लिपि/भाषाओं में थीं।
अभी भी कंदम स्कूल में प्राचीन ग्रंथ उपलब्ध हैं जो उपरोक्त राजनीतिक परिदृश्य का भेद खोल सकते हैं। आखिर, अंग देश के इतिहास के लिए यह संभव किससे होगा?

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वृहदेश्वर मंदिर के निर्माणकर्ता डाकिनी के भक्त
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11वीं सदी के प्रतापी सम्राट राजराजा चोल जिन्होंने गंगा के दक्षिणी ओर के भूभाग पर प्रभुत्व स्थापित कर 'गंगईकोंड चोल' की उपाधि धारण की थी वे शिव भक्त के तौर पर जाने जाते हैं। सच यह भी है कि वे डाकिनी के साधक थे। विदित हो कि डाकिनी को देवि काली की एक उग्र शक्ति-रूप में मान्यता प्राप्त है। यह भी माना जाता है कि प्रकृति (पृथ्वी) की ऋणात्मक ऊर्जा से उत्पन्न एक स्थायी गुण ही डाकिनी है जो निश्चित आकृति में दिखाई देती है। इनकी श्मसान साधना का विधान है।
मलय (Malaysia) के इतिहास में कहा गया है कि इन्हीं शक्ति के आवाहन के समय वे अपना खड्ग यानी तलवार पूजन करते थे फिर युद्ध की समाप्ति के उपरांत ही म्यान में रखते थे। श्रीलंका, मालदीव और पूर्व एशिया के कुछ देश इनके साम्राज्य में शामिल थे।
इनकी तलवार 20 किलो से अधिक वजन की थी जिसका नाम था चोरा मन डाकिनी ! कुछ लोग इसे 'चोला मंदाकिनी' भी कहते हैं। यह तलवार आज भी मलेशिया में सुरक्षित है। इसके बारे में कहा गया है - The Magical Object guarded by a Female Spirit.
राजराजा चोल के जिस साम्राज्य को 'बंग साम्राज्य' के भूभाग और गंगा के दक्षिणी इलाके से जोड़कर आजतक इतिहास कहा जाता है उसमें यह क्षेत्र शामिल होने के प्रमाण मिलते हैं
मंदार के नीचे के पत्थर के एक भवन को 'चोल साम्राज्य का निवास' 19वीं सदी से कहा जाता रहा है। बहुतायत में यहाँ शिवलिंग का होना तथा श्मसान में दक्षिणमुखी शिवलिंग होना भी कुछ संबंध परिलक्षित करते हैं।
अहं को त्यागकर, इतिहास को एक नए सिरे से देखे जाने की जरूरत है।


Chloroquine के निर्माता का भागलपुर कनेक्शन

HydroxyChloroquine Sulphate के साथ जुड़ा है एक राष्ट्रवादी भारतीय वैज्ञानिक का नाम। इन्होंने क्लोरोक्वीन फॉस्फेट बनाया था जो मलेरिया की दवा के तौर पर प्रयोग किया जाता था। तब सम्पूर्ण भारत में मलेरिया से बहुत लोग मरते थे। भागलपुर में गंगा के उत्तरी भाग में इससे मरनेवालों की संख्या ज्यादा ही थी।
भारत में इसे सबसे पहले बनाने वाले बंगाल केमिकल्स के जनक थे आचार्य प्रफुल्ल चंद्र राय। इन्होंने हिन्दू रसायन का इतिहास' लिखा जिसका मूल रूप A history of Hindu chemistry from the earliest times to the middle of the sixteenth century, A.D है। 'द ग्रीक एल्केमी' पुस्तक के लेखक बर्थेलो ने इनकी प्रशंसा मुक्तकंठ से की।
बंगाल केमिकल्स ने पहली बार इस दवा का निर्माण सन 1934 में किया था। यह देश में क्लोरोक्वीन दवाई बनाने की सबसे बड़ी कंपनी है जिसका पूरा नाम है - बंगाल केमिकल्स एंड फार्मास्यूटिकल्स लिमिटेड। इसकी स्थापना आज से 119 साल पहले आचार्य राय ने की थी। पिछले काफी समय से बंगाल केमिकल्स ने हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन का उत्पादन नहीं किया है।बंगाल केमिकल्स दरअसल क्लोरोक्वीन फॉस्फेट बनाती रही है, जिसका उपयोग मलेरिया की दवाई के रूप में होता रहा है। क्लोरोक्वीन फॉस्फेट का भी वही प्रभाव है जो हाल ही में चर्चा में आयी हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन सल्फेट का। लेकिन बंगाल केमिकल्स ने हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन सल्फेट उत्पादन पिछले कुछ सालों से बंद कर दिया है। उल्लेखनीय है कि बंगाल केमिकल्स इस दवाई को बनाने वाली सार्वजनिक क्षेत्र की एकमात्र कंपनी है। नए नियमों के अनुसार इस दवाई को बनाने के लिए अब कंपनी को फिर से लायसेंस लेना होगा।
भागलपुर कॉलेज में केमिस्ट्री (रसायन शास्त्र) के लेक्चरर के तौर पर सन 1908 में योगदान देने वाले जोगेश चंद्र घोष इनके प्रिय शिष्यों में से एक थे। इनके बुलावे पर आचार्य 1909 में भागलपुर आए थे। तब वे प्रेसीडेंसी कालेज के रसायन विभाग में बतौर सहायक प्रवक्ता कार्यरत थे। तब वे यहाँ के ब्रह्म समाज से जुड़े लोगों से भी मिले थे। इनसे पहले आचार्य पीसी राय के पिता 'ब्रह्म समाज' के कार्यक्रम में हिस्सा लेने भागलपुर आए थे। आचार्य पीसी राय आजन्म कुँवारे रहे।
इन्होंने भागलपुर में कविराजों (आयुर्वेद के प्रैक्टिशनरों) को देखकर शिष्य जोगेन्द्र को कहा था कि आयुर्वेद का क्षेत्र व्यापक है और आप भारतीयों के कल्याण के लिए इस तरफ ध्यान दीजिये। इस बात का इतना व्यापक असर हुआ कि सेवामुक्त होने के बाद इन्होंने साधना औषधालय की स्थापना की। ढाका से आरंभ हुआ यह औषधालय पहले बंगाल के विभिन्न स्थानों में खुला। फिर भागलपुर और मुंगेर में भी। फिर चीन, उत्तरी अमरीका, अफ्रीका में। सनद रहे कि ये वही जोगेश चंद्र थे जिनकी हत्या पाकिस्तानी सैनिकों ने ऑपरेशन सर्चलाइट के दरम्यान 1971 में कर दी थी।
मातृभूमि, मातृभाषा और अपने आर्ष मनीषियों की महान परंपरा का पालन करनेवाले वैज्ञानिक डॉ. प्रफुल्ल चंद्र राय को आज मानवता की रक्षा करने के लिए अखिल विश्व याद करेगा।